संस्कृत नाट्याचार्य मुनि भारत ने साहित्य की रूपक विधा को "लोकव्रत्तानुकरणम नाट्यम" कहकर इसमे जीवन के पक्ष - प्रतिपक्ष का प्रतिबिम्बन स्वीकारा है| हमारे जीवन से जुड़े हुए प्राय: सभी पहलु यथा समय भिन्न-भिन्न नाट्यशिल्पियों के द्वारा इस मायने में रूपायित होते हैं| युवा साहित्य सर्जक डॉ. हुसैनी बोहरा ने भी अपनी कविता लेखनी के साथ - साथ अपनी कलम को द्रश्य काव्य विधान की और मोड़ा है और उनकी एक मसिधर्मी छटपटाहट अपनी सम्पूर्ण ईमानदारी से इन रचनाओं में पाठक अनुभव कर सकते हैं|




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